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Wednesday, September 16, 2009

हर सजा हमें मंज़ूर है - Har Saza Hamein Manzoor Hai

हर सांस में उसका नूर है,
पर दीद से कितना दूर है,
चलो चाँद से बात करें,
वो क्यों इतना मग़रूर है,
रोज़ ० शब् पत्थर सोते,
नक्काश मगर मजबूर है,
जाना खली हाथ है सबको,
ज़माने का दस्तूर है,
दगा कलम से नहीं करेंगे,
हर सजा हमें मंज़ूर है,
पता पूछती है रुसवाई
नाम जिसका मशहूर है,
दर्द वो जाने क्या ज़ुल्मत का,
हर पल जहाँ पे नूर है,
तुम भी सो जाओ अहसास,
अभी शब् जरा मखमूर है...!!!

मेरी जिंदगी की किताब से - Meri Zindgi Ki Kitab Se

ये अकेलेपन की उदासियाँ ये फिराक लम्हे अजाब के,
कभी दस्त-ए-दिल पे भी आ रुकें तेरी चाहतों के काफिले,

मैं हूँ तुझको जान से अजीज मैं ये कैसे मान लूं अजनबी,
तेरी बात लगती है वहम सी तेरे लफ्ज़ लगते है ख्वाब से,

ये जो मेरा रंग है रूप है यूं ही बेसबब नहीं दोस्तों,
मेरे खुशबुओं से है सिलसिले मेरी निस्बतें हैं गुलाब से,

वोही मोतबर है मेरे लिए वो ही हासिल-ए-दिल ओ जान है,
वो जो बाब तुमने चुरा लिया मेरी जिंदगी की किताब से...!!!


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Wednesday, September 9, 2009

सारा खेल ही लफ्जों का है - Lafz

कड़वे होते हैं,
मीठे होते हैं,
सचे होते हैं,
झूठे होते हैं,
ज़हरीले होते हैं,
नशीले होते हैं,
जादू कर देते हैं,
पागल कर देते हैं,
कटीले होते हैं,
नुकीले होते हैं,
कहीं मातम कर देते हैं,
कहीं खुशियाँ भर देते हैं,

सारा खेल ही लफ्जों का है...!!!

उम्मीद दिलाते हैं ज़माने वाले - Umeed Dilate Hain Zamane Wale

यूँ ही उम्मीद दिलाते हैं ज़माने वाले,
कब पलटते हैं भला छोड़ के जाने वाले,

तू कभी देख झुलसते हुए सेहरा में दरख्त,
कैसे जलते हैं वफाओं को निभाने वाले,

उन से आती है तेरे लम्स की खुशबु अब तक,
ख़त निकाले हुए बैठा हूँ पुराने वाले,

आ कभी देख ज़रा उन की शबों में आकर,
कितना रोते हैं ज़माने को हंसाने वाले,

कुछ तो आँखों की ज़ुबानी भी कहे जाते हैं,
राज़ होते नहीं सब मुंह से बताने वाले,

आज न चाँद ना तारा है ना जुगनू कोई,
राब्ते ख़तम हुए उन से मिलाने वाले...!!!

घर आओ किसी दिन - Ghar Aao Kisi Din

चेहरे पे मेरे जुल्फ को फैलाओ किसी दिन,
क्या रोज़ गरजते हो बरस जाओ किसी दिन,

राजों की तरह उतरो मेरे दिल में किसी शब्,
दस्तक पे मेरे हाथ की खुल जाओ किसी दिन,

पैरों की तरह हुस्न की बारिश में नहा लो,
बादल की तरह झूम के घर आओ किसी दिन,

खुशबू की तरह गुजरो मेरे दिल की गली से,
फूलों की तरह मुझ पे बिखर जाओ किसी दिन,

फिर हाथ की खैरात मिले बंद कुबा को,
फिर लुत्फ़ शब्-ए-वस्ल को दोहराओ किसी दिन,

गुजरें जो मेरे घर से तो रुक जाएँ सितारे,
कुछ इस तरह मेरी रात को चमकाओ किसी दिन,

मैं अपनी हर इक सांस उसी रात को दे दूं,
सर रख के मेरे सीने पे सो जाओ किसी दिन...!!!

Tuesday, September 1, 2009

बेगाना कर गया हमको (Begana Kar Gaya Humko)

कभी है तल्ख़ सा लहजा कभी सबा की तरह,
मिजाज अपना बदलता है वो हवा की तरह,

वो अपने आप से बेगाना कर गया हमको,
एक अजनबी जो मिला खास आशना की तरह,

क़दम क़दम पे भटकना कबूल है मुझको,
अगर तू साथ रहे मेरे रहनुमा की तरह,

हम उस की याद की दिल से लगा के जी लेंगे,
भुला सके तो भुला दे वो बेवफा की तरह....!!!


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Monday, August 31, 2009

मुझे भुला के दिखा (Mujhe Bhula Ke Dikha)

तूं अपने फन से मेरी चाहत को अजमा के दिखा,
मैं टूट'ता हूँ तूं फिर से मुझे बना के दिखा,

तेरे बदन में लहू बन के दौड़ता हूँ मैं,
तुझे खुदा की कसम है मुझे भुला के दिखा,

मैं इतने दर्द में भी क़हक़हे लगाता हूँ,
तूं एक दुःख में सिर्फ मुझे मुस्कुरा के दिखा,

तुझे तो मैंने हमेशा मनाया है लेकिन,
मैं आज रूठ चला हूँ मुझे मना के दिखा...!!!


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Thursday, August 27, 2009

कभी सोचे वो भी (Kabhi Soche Wo Bhi)

इश्क सेहा है के दरिया कभी सोचे वो भी,
उस से क्या है मेरा नाता कभी सोचे वो भी,

हाँ मैं तन्हा हूँ ये इकरार भी कर लेता हूँ,
खुद भी वो तन्हा है कितना कभी सोचे वो भी,

ये अलग बात है के जताया नहीं मैंने उस को,
वरना कितना उसे चाहा कभी सोचे वो भी,

उसे आवाज़ लिखा, चाँद लिखा, फूल लिखा,
मैंने क्या क्या उसे लिखा कभी सोचे वो भी,

मुतमें हूँ उसे लफ्जों की हरारत दे कर,
मैंने कितना उसे सोचा कभी सोचे वो भी...!!!


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शायद नींद आ जाये (Shayad Neend Aa Jaye)

ज़रा सी रात ढल जाये तो शायद नींद आ जाये,
ज़रा सा दिल बहल जाये तो शायद नींद आ जाये,

अभी तो कुर्ब है बेचैनी है बेक़रारी है,
तबीयत कुछ संभल जाये तो शायद नींद आ जाये,

अभी तो नरम झोंकों में छुपे है तीर यादों के,
हवा का रुख बदल जाये तो शायद नींद आ जाये,

ये हँसता और मुस्कुराता काफिला चाँद और तारों का,
ज़रा आगे निकल जाये तो शायद नींद आ जाये,

ये तूफ़ान आंसुओं का जो उभर आया है पलकों पर,
किसी सूरत से टल जाये तो शायद नींद आ जाये...!!!


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ज़माने बीत जाते हैं - Zamane Beet Jaate Hain

कभी नज़रें मिलाने में ज़माने बीत जाते हैं,
कभी नज़रें चुराने में ज़माने बीत जाते हैं,

किसी ने आँख भी खोली तो सोने की नगरी में,
किसी को घर बनाने में ज़माने बीत जाते हैं,

कभी काली स्याह रातें भी पल पल की लगती हैं,
कभी सूरज को आने में ज़माने बीत जाते हैं,

कभी खोला घर का दरवाजा तो मंजिल सामने थी,
कभी मंजिल को पाने में ज़माने बीत जाते हैं,

चंद लम्हों में टूट जाते हैं उम्र भर के वो बंधन,
वो बंधन जो बनाने में ज़माने बीत जाते हैं....!!!!


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